Yogi Adityanath: भारतीय राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा है कि 2029 के बाद अगर बीजेपी की तरफ से कोई सबसे बड़ा चेहरा सामने आता है, तो वो नाम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का है। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि अगर यूपी में बीजेपी 2027 का चुनाव दोबारा जीत जाती है, तो योगी आदित्यनाथ का कद पार्टी और देश की राजनीति में और भी ज्यादा बड़ा हो जाएगा। लेकिन एक मुख्यमंत्री की कुर्सी से निकलकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय करना इतना आसान नहीं होता।
योगी आदित्यनाथ भले ही आज बीजेपी के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक हों, लेकिन 2029 में देश का नेतृत्व करने से पहले उनके सामने कुछ ऐसी बड़ी चुनौतियां और कमियां हैं, जिन्हें उन्हें अगले 2 से 3 सालों में हर हाल में पूरा करना होगा।
गोरखपुर के महंत से यूपी के CM तक, अब दिल्ली की राह
योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक यात्रा को अगर हम शुरू से देखें, तो गोरखपुर के एक महंत से लेकर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर बहुत ही असाधारण रहा है। अपनी सख्त छवि, बुलडोज़र वाली कानून-व्यवस्था और फायरब्रांड बयानों की वजह से उन्होंने बीजेपी समर्थकों के बीच अपनी एक अलग और बहुत मजबूत पहचान बनाई है। (Yogi Adityanath)
जब भी बीजेपी के भावी प्रधानमंत्री की बात होती है, तो समर्थकों की पहली पसंद योगी ही बनते हैं। लेकिन एक राज्य को चलाना और पूरे देश की नुमाइंदगी करना दो बिल्कुल अलग बातें होती हैं। देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए सिर्फ अपनी पुरानी छवि के भरोसे नहीं चला जा सकता, बल्कि देश और दुनिया के सामने खुद को एक नए और बड़े विज़न के साथ प्रोजेक्ट करना पड़ता है।
सबसे बड़ी चुनौती: कट्टर हिंदुत्व की छवि से सर्वजन के नेता तक
योगी आदित्यनाथ के सामने जो सबसे पहली और बड़ी चुनौती है, वो है उनकी ‘कट्टर हिंदुत्व’ वाली छवि को बदलकर खुद को ‘सर्वजन का चेहरा’ बनाना। एक मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी सख्त छवि से चुनाव जीतना एक अलग बात है, लेकिन जब बात देश के प्रधानमंत्री बनने की आती है, तो नेता को धर्म, जाति और वर्ग से ऊपर उठकर हर नागरिक को साथ लेकर चलना पड़ता है। (Yogi Adityanath)
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पीएम किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे 140 करोड़ देशवासियों का प्रतिनिधि होता है। योगी आदित्यनाथ को अपनी उस छवि को थोड़ा ढीला करना पड़ेगा और यह साबित करना होगा कि वे केवल हिंदुत्व का चेहरा नहीं हैं, बल्कि वे देश के हर नागरिक के नेता हैं। जब तक वे इस छवि के दायरे से बाहर निकलकर खुद को एक समावेशी नेता के रूप में पेश नहीं करेंगे, तब तक देश के हर तबके का भरोसा जीतना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।
‘अकेला चलो’ से आगे, योगी को बनानी होगी मजबूत टीम
दूसरी बड़ी बात जो योगी की कार्यशैली में देखी जाती है, वो है उनका ‘अकेला चलो’ वाला रवैया। यूपी की सत्ता संभालते वक्त अक्सर यह मैसेज जाता है कि जो कुछ हैं, वही हैं और फैसले सिर्फ उनके स्तर पर ही लिए जाते हैं। लेकिन दिल्ली की सत्ता चलाने के लिए और एक प्रधानमंत्री के रूप में काम करने के लिए आपको अपने आसपास एक बहुत मजबूत और योग्य लीडरशिप की टीम खड़ी करनी पड़ती है। (Yogi Adityanath)
पीएम मोदी की सफलता के पीछे भी एक बड़ी टीम, रणनीतिकारों और मंत्रियों का एक पूरा सपोर्ट सिस्टम काम करता है। योगी आदित्यनाथ के आसपास फिलहाल ऐसी कोई दूसरी बड़ी लीडरशिप नज़र नहीं आती जो उन्हें सपोर्टिंग रोल में लाकर एक राष्ट्रीय स्तर का बैकअप दे सके। अगले कुछ सालों में योगी को अपने आसपास एक ऐसी मजबूत टीम और सहयोगियों का दायरा तैयार करना पड़ेगा जो उनके राष्ट्रीय विज़न को ज़मीन पर उतार सके।
RSS और BJP संगठन का भरोसा जीतना क्यों जरूरी?
तीसरी अहम चुनौती है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और बीजेपी के केंद्रीय संगठन के साथ तालमेल और बेहतर करना। ऐसा नहीं है कि संघ से उनके रिश्ते खराब हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि बीच-बीच में संघ और योगी के बीच की ट्यूनिंग में थोड़े उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। कभी बातें मानी गईं, कभी अनदेखी हुई, तो कभी अंदर ही अंदर नाराजगी की खबरें भी आईं।
दिल्ली की गद्दी तक पहुंचने के लिए संघ का पूरा और अटूट समर्थन सबसे ज्यादा मायने रखता है। योगी को संघ के बड़े पदाधिकारियों और दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व के साथ अपने कॉर्डिनेशन को और ज्यादा मजबूत, स्मूथ और भरोसेमंद बनाना होगा, ताकि जब 2029 का वक्त आए तो संगठन के अंदर से उनके नाम पर कोई झिझक या सवाल न खड़ा हो। (Yogi Adityanath)
लखनऊ से ग्लोबल मंच तक, योगी को बदलनी होगी अपनी छवि
चौथी और सबसे इम्पोर्टेंट चीज़, जो एक प्रधानमंत्री को मुख्यमंत्री से अलग बनाती है, वो है ग्लोबल पर्सपेक्टिव और इंटरनेशनल लेवल पर अपनी पकड़ बनाना। एक राज्य का सीएम अपने स्टेट की कानून-व्यवस्था, लोकल डेवलपमेंट और बजट तक सीमित रहता है। लेकिन देश का प्रधानमंत्री पूरे भारत का चेहरा होता है।
जब कोई पीएम विदेशी दौरों पर जाता है, तो उसे सिर्फ अपने देश की बात नहीं करनी होती, बल्कि उसे ग्लोबल इकोनॉमी, फॉरेन पॉलिसी, स्पेस साइंस, नई टेक्नोलॉजी, एनवायरनमेंट और ग्लोबल ट्रेड जैसे बहुत ही जटिल और बड़े मुद्दों पर बात करनी होती है। योगी आदित्यनाथ को दुनिया के सामने खुद को एक ऐसे ग्लोबल लीडर के रूप में प्रोजेक्ट करना होगा जो इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म्स पर भारत का प्रतिनिधित्व मजबूती से कर सके। (Yogi Adityanath)
BJP के अंदर दूसरे दावेदारों से कैसे मुकाबला करेंगे योगी?
पांचवीं और आखिरी बड़ी चुनौती है पार्टी के अंदरूनी कॉम्पेटिशन को खत्म करना और अपने फोकस को लखनऊ से हटाकर दिल्ली की तरफ शिफ्ट करना। बीजेपी के अंदर प्रधानमंत्री पद की रेस में सिर्फ योगी अकेले नहीं हैं, कई और बड़े चेहरे भी रेस में माने जाते हैं। ऐसे में योगी को पार्टी के भीतर किसी भी तरह के विरोध या कॉम्पेटिशन को खत्म करके सबको साथ जोड़ने की कला सीखनी होगी।
उन्हें दिल्ली के केंद्रीय नेताओं के साथ अपना तालमेल बहुत बढ़ाना होगा और धीरे-धीरे अपने राजनीतिक सेंटर को यूपी के राज्य स्तरीय मुद्दों से निकालकर राष्ट्रीय मुद्दों पर शिफ्ट करना पड़ेगा। अगर वे अपना पूरा ध्यान सिर्फ लखनऊ तक ही सीमित रखेंगे, तो दिल्ली की गद्दी पर दावा ठोकना मुश्किल हो जाएगा। (Yogi Adityanath)
PM बनने के लिए सिर्फ लोकप्रियता नहीं, ग्लोबल विज़न भी जरूरी
योगी को समझना होगा कि जब कोई प्रधानमंत्री ब्रिक्स समिट में जाता है, आईएमएफ के प्रोग्राम्स में हिस्सा लेता है, या वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम जैसी वैश्विक बैठकों में बैठता है, तो वहां दुनिया के सबसे बड़े अर्थशास्त्रियों और राष्ट्रध्यक्षों से आंखें मिलाकर बात करनी पड़ती है।
योगी आदित्यनाथ को या तो अपने साथ ऐसे बेहद काबिल और एक्सपर्ट अधिकारियों व सलाहकारों की टीम इकट्ठी करनी पड़ेगी जो उन्हें इंटरनेशनल मामलों में पूरी तरह ग्रूम कर सकें, या फिर खुद अपनी समझ और विज़न को दुनिया के सामने इस तरह प्रोजेक्ट करना होगा कि इंटरनेशनल कम्युनिटी भी उन्हें सिर्फ एक धार्मिक या क्षेत्रीय नेता न मानकर एक मैच्योर्ड ग्लोबल स्टेट्समैन के रूप में देखे। दुनिया के बाकी देशों को यह भरोसा होना चाहिए कि भारत का अगला नेता ग्लोबल लीडरशिप देने में पूरी तरह सक्षम है। (Yogi Adityanath)
क्या 2029 में मोदी के बाद योगी ही होंगे सबसे बड़ा चेहरा?
अगर इन तमाम पहलुओं को एक साथ जोड़कर देखें, तो यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि योगी आदित्यनाथ के पास प्रधानमंत्री बनने की काबिलियत और लोकप्रियता दोनों मौजूद हैं। लेकिन 2029 की रेस जीतने के लिए सिर्फ पुरानी लोकप्रियता काफी नहीं होगी। उन्हें अगले 2 से 3 सालों के अंदर अपनी ‘कट्टर हिंदुत्व’ वाली इमेज को सर्वजन के नेता में बदलना होगा, अपने आसपास एक मजबूत टीम खड़ी करनी होगी, संघ और दिल्ली से कॉर्डिनेशन परफेक्ट करना होगा, और सबसे बढ़कर ग्लोबल इकोनॉमी व फॉरेन पॉलिसी पर अपनी पकड़ साबित करनी होगी।
अगर योगी आदित्यनाथ इन 5 मोर्चों पर खुद को साबित कर लेते हैं, तो 2029 में नरेंद्र मोदी के बाद वे देश के सबसे मजबूत और स्वाभाविक प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन सकते हैं। वरना राजनीति में वक्त बदलते देर नहीं लगती, और आगे चलकर ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। (Yogi Adityanath)









