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क्या 2027 चुनाव से पहले यूपी में लागू होगा UCC? भाजपा को फायदा या नुकसान, जानिए क्या-क्या बदल सकता है

UP Election 2027

UP Election 2027: समान नागरिक संहिता यानी UCC एक बार फिर भारतीय राजनीति के केंद्र में है। दरअसल, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर 2026 को एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने घोषणा की कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सभी 21 BJP-NDA शासित राज्यों में UCC लागू किया जाएगा। इसके बाद से यूपी की सियासत गरमा गई है। राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 हटाने के बाद UCC भाजपा का अगला सबसे बड़ा वैचारिक एजेंडा है।

राज्य में 2027 के विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या यूपी चुनाव से पहले योगी सरकार UCC को जमीन पर उतारेगी? आइए विस्तार से समझते हैं कि क्या चुनाव से पहले यूपी में UCC लागू होगा, इससे भाजपा को सियासी फायदा होगा या नुकसान, आम जनता के जीवन में इससे क्या बदलेगा और क्या लिव-इन रिलेशनशिप को भी इसके तहत कानूनी दर्जा मिलेगा?

UP Election 2027: क्या चुनाव से पहले यूपी में लागू होगा UCC?

राजनीतिक गलियारों और भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार आचार संहिता लागू होने से पहले विधानसभा में UCC बिल पेश कर सकती है या इसकी औपचारिक घोषणा कर सकती है। हालाँकि, विधानसभा से बिल पास होने और राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी के बाद इसे धरातल पर पूरी तरह लागू होने में कुछ महीनों का समय लग सकता है।

भाजपा की यह एक सोची-समझी रणनीति है कि पूरे देश में एक साथ केंद्रीय कानून बनाने के बजाय इसे राज्य दर राज्य लागू किया जाए। क्योंकि विवाह, तलाक और संपत्ति जैसे विषय संविधान की समवर्ती सूची में आते हैं, इसलिए राज्य सरकारों को इस पर कानून बनाने का पूरा अधिकार है। उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों ने पहले ही अपने-अपने बिल पारित कर दिए हैं या प्रक्रिया में हैं। उत्तर प्रदेश में भी चुनाव से ठीक पहले ध्रुवीकरण और वैचारिक एजेंडे को धार देने के लिए इसे बड़े दांव के रूप में देखा जा रहा है। (UP Election 2027)

भाजपा को फायदा होगा या नुकसान?

यूपी की राजनीति में UCC का आना एक बड़ा ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद, UCC भाजपा के सबसे पुराने वैचारिक वादों में से एक है। इसे लागू कर भाजपा अपने कोर वोटर्स को यह संदेश देगी कि वह अपने हर वादे को पूरा कर रही है।

भाजपा के प्रदेश नेतृत्व भूपेंद्र सिंह चौधरी का कहना है कि जब तक UCC नहीं आता, तब तक महिलाओं को उनके अधिकारों का पूर्ण संरक्षण नहीं मिल सकता। तीन तलाक विरोधी कानून की तरह, UCC के जरिए भी भाजपा आधी आबादी विशेषकर मुस्लिम महिलाओं के एक वर्ग के बीच पैठ बनाने की कोशिश करेगी। राहत की बात यह है कि यूपी में भाजपा के सभी प्रमुख सहयोगी दल फिलहाल इस मुद्दे पर भाजपा के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। (UP Election 2027)

संभावित नुकसान और चुनौतियां: सपा-विपक्ष को फायदा

वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि यूपी में UCC आने से भाजपा से ज्यादा समाजवादी पार्टी (सपा) को सियासी फायदा हो सकता है। सपा और असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) जैसे नेता इसके विरोध में उतरेंगे और तर्क देंगे कि भारत विविधताओं का देश है और इसे थोपा नहीं जाना चाहिए। इससे मुस्लिम और सेकुलर वोटों का पूरी तरह से सपा के पक्ष में ध्रुवीकरण हो सकता है, जिससे विपक्ष और मजबूत हो सकता है।

हालांकि यूपी में आदिवासी आबादी अन्य राज्यों जैसे असम या एमपी जितनी बड़ी नहीं है, लेकिन पूर्वांचल और बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों में स्थानीय जातियों और परंपराओं को छूट न देने पर नाराजगी का खतरा भी रहेगा। (UP Election 2027)

UCC लागू होने से उत्तर प्रदेश में क्या-क्या बदलेगा?

अगर उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड या मध्य प्रदेश के मॉडल पर आधारित समान नागरिक संहिता लागू होती है, तो व्यक्तिगत कानूनों में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। वर्तमान में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पुरुषों को एक से अधिक शादियों की छूट है। UCC लागू होने के बाद सभी धर्मों के नागरिकों के लिए केवल एक शादी का नियम होगा। दूसरी शादी करना कानूनी अपराध माना जाएगा। फिलहाल अलग-अलग धर्मों में तलाक की प्रक्रियाएं अलग हैं। UCC के तहत पति और पत्नी दोनों के लिए तलाक के आधार और कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह समान होगी।

इस्लाम के अलावा लगभग सभी धर्मों में बेटियों को संपत्ति में बराबरी का अधिकार पहले से ही मिला हुआ है। UCC के बाद मुस्लिम परिवारों में भी बेटियों को बेटों के बराबर पैतृक संपत्ति का अधिकार अनिवार्य हो जाएगा। इसके अलावा, मुस्लिम पर्सनल लॉ में गोद लिए गए बच्चे को जैविक बच्चे की तरह संपत्ति का स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं माना जाता। UCC के बाद गोद लिए गए बच्चे को भी माता-पिता की संपत्ति में सभी धर्मों में समान कानूनी अधिकार मिलेगा। (UP Election 2027)

क्या लिव-इन रिलेशनशिप को भी मिलेगा कानूनी दर्जा?

UCC के तहत सबसे ज्यादा चर्चा लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर है। अगर उत्तर प्रदेश सरकार उत्तराखंड और मध्य प्रदेश के ड्राफ्ट को आधार बनाती है, तो लिव-इन को कानूनी दायरे में लाया जाएगा। लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को जिला प्रशासन या संबंधित अथॉरिटी के पास रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। ऐसा न करने पर जुर्माने या जेल की सजा का प्रावधान हो सकता है।

UCC के तहत लिव-इन में रहने वाली महिलाओं के अधिकार सुरक्षित किए जाएंगे। अगर कोई पुरुष अपनी लिव-इन पार्टनर को बिना वजह छोड़ देता है, तो महिला अदालत के जरिए भरण-पोषण का दावा कर सकेगी।लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चों को पूरी तरह से वैध माना जाएगा और उन्हें माता-पिता की संपत्ति में कानूनी उत्तराधिकार मिलेगा। (UP Election 2027)

उत्तर प्रदेश में चुनाव से ठीक पहले UCC का कार्ड खेलना भाजपा के लिए वैचारिक रूप से एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है, लेकिन यह चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि जमीन पर जनता इसे समानता और सुधार के रूप में देखती है या विपक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार के रूप में भुनाने में सफल रहता है। बहरहाल, यदि यह लागू होता है, तो उत्तर प्रदेश के सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने में आजादी के बाद का यह सबसे बड़ा कानूनी बदलाव होगा।

Vaishali
Author: Vaishali

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