Uttar Pradesh Medical Colleges: उत्तर प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में MBBS दाखिले के लिए लागू करीब 91 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को बहाल रखने की राज्य सरकार की कोशिशों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जिसमें इन कॉलेजों में अत्यधिक आरक्षण पर रोक लगा दी गई थी। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया है, जिसका सीधा अर्थ है कि अब इन कॉलेजों में दाखिला सामान्य आरक्षण नियमों के तहत ही होगा।
Uttar Pradesh Medical Colleges: क्या है पूरा मामला?
यह विवाद उत्तर प्रदेश के चार विशिष्ट सरकारी मेडिकल कॉलेजों अंबेडकर नगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर से जुड़ा है। इन कॉलेजों की स्थापना बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सरकार के कार्यकाल के दौरान ‘स्पेशल कंपोनेंट प्लान’ (SCP) के तहत की गई थी।
इस विशेष योजना के आधार पर राज्य सरकार ने इन कॉलेजों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों के लिए आरक्षित सीटों का प्रतिशत सामान्य से काफी अधिक रखा था। राज्य सरकार ने 2026-27 के शैक्षणिक सत्र के लिए इन कॉलेजों की कुल सीटों में से करीब 91% सीटें आरक्षित श्रेणी के लिए निर्धारित कर दी थीं।
इस नीति के तहत सीटों का बंटवारा कुछ इस प्रकार था-
- अनुसूचित जाति (SC): 62 सीटें (लगभग 72.94%)
- अनुसूचित जनजाति (ST): 5 सीटें (लगभग 5.88%)
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 11 सीटें (लगभग 12.95%)
- अनारक्षित (General/UR): केवल 7 सीटें (लगभग 8.24%)
इस व्यवस्था के खिलाफ छात्रों और ‘यूथ फॉर इक्वॉलिटी’ जैसे संगठनों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, उनका तर्क था कि यह व्यवस्था संविधान द्वारा निर्धारित 50% आरक्षण की सीमा का उल्लंघन है और सामान्य वर्ग के मेधावी छात्रों के साथ अन्याय है। (Uttar Pradesh Medical Colleges)
इलाहाबाद हाईकोर्ट का 16 सितंबर का आदेश
याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 16 सितंबर 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने सरकार के उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें 91% आरक्षण का प्रावधान था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि सुप्रीम कोर्ट के ‘इंदिरा साहनी’ फैसले के अनुसार आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं हो सकती।
राज्य सरकार ने कोर्ट में पहले दिए गए उस आश्वासन का उल्लंघन किया है, जिसमें कहा गया था कि वह ‘यूपी लोक सेवा अधिनियम, 2006’ के प्रावधानों का पालन करेगी। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि इन चार कॉलेजों में भी काउंसलिंग अन्य सरकारी कॉलेजों की तरह ही होगी। यानी अब यहां भी 21% SC, 2% ST और 27% OBC आरक्षण का नियम लागू होगा। (Uttar Pradesh Medical Colleges)
सुप्रीम कोर्ट में सरकार की अपील और विफलता
हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार ने तत्काल सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सरकार ने तर्क दिया कि ये कॉलेज विशेष उद्देश्य से बनाए गए थे, इसलिए यहां विशेष आरक्षण लागू होना चाहिए। सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने और अपनी आरक्षण नीति को बहाल करने के लिए विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और 30 सितंबर को हुई सुनवाई में याचिका को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि मौजूदा सत्र (2026-27) के लिए दाखिले हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए मानक रोस्टर के अनुसार ही होंगे। (Uttar Pradesh Medical Colleges)
छात्रों पर क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से सामान्य वर्ग और ओबीसी वर्ग के छात्रों को बड़ी राहत मिली है। 91% आरक्षण लागू होने की स्थिति में इन चार कॉलेजों में सामान्य वर्ग के लिए सीटें न के बराबर थीं। अब मानक रोस्टर लागू होने से सामान्य वर्ग के लिए सीटें बढ़ेंगी। ओबीसी छात्रों को भी उनका निर्धारित 27% कोटा मिलेगा, जो पहले की विषम व्यवस्था में प्रभावित हो सकता था। काउंसलिंग प्रक्रिया अब बिना किसी असमंजस के आगे बढ़ सकेगी, जिसे लेकर छात्र काफी समय से परेशान थे।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस मामले ने राजनीतिक तूल भी पकड़ा था। बसपा प्रमुख मायावती ने हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार की आलोचना की थी और कहा था कि सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से नहीं रखा। उन्होंने सरकार से सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की मांग भी की थी। सरकार ने अपील तो की, लेकिन उसे सर्वोच्च न्यायालय से राहत नहीं मिली। वहीं, याचिकाकर्ता छात्रों ने इसे “संविधान और योग्यता की जीत” बताया है। (Uttar Pradesh Medical Colleges)









