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“स्वच्छता के ‘नंबर-1’ शहर को HC की फटकार— ‘मजबूरी नहीं, यह हत्या है’, नगर निगम और प्रशासन से मांगा जवाब।”

इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले में आज मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर खंडपीठ) ने ऐतिहासिक सुनवाई की। अदालत ने न केवल नगर निगम(NAGAR NIGAM) को आड़े हाथों लिया, बल्कि इसे ‘मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन’ करार दिया है। “जिस शहर को हम सफाई का ‘ब्रांड एंबेसडर'(BRAND AMBESSDOR) कहते थे, क्या वह अब अपने ही नागरिकों के लिए काल बन गया है? जब इंदौर के भागीरथपुरा में मासूमों की सांसें गंदे पानी की भेंट चढ़ गईं, तब आज हाईकोर्ट (HIGH COURT) ने वो कह दिया जो हर आम आदमी की चीख थी। जस्टिस की बेंच ने तल्ख लहज़े में पूछा— ‘क्या इंसानी जान की कीमत पाइपलाइन से भी सस्ती हो गई है?’ जानिए अदालत की उस फटकार के बारे में, जिसने प्रशासन की नींद उड़ा दी है।” आज की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भागीरथपुरा और आसपास के इलाकों में फैली डायरिया और हैजा की महामारी पर संज्ञान लिया।

हाई कोर्ट नें क्या कुछ कहा

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस द्वारकाधीश बंसल और जस्टिस राजेंद्र कुमार वाणी की खंडपीठ ने साफ शब्दों में कहा कि यह एक बड़ी लापरवाही है और लोग पानी की वजह से मर रहे हैं, जो पूरी तरह गलत है। हाई कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि प्रभावित लोगों को नियमित रूप से स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाए और दूषित पानी से बीमार हुए सभी लोगों को सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधा दी जाए।

हाई कोर्ट ने 31 दिसंबर की सुनवाई में नगर निगम को सभी प्रभावितों का मुफ्त इलाज कराने और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के अंतरिम निर्देश दिए थे। 2 जनवरी को इन आदेशों के पालन को लेकर स्टेटस रिपोर्ट पेश की गई। साथ ही एक तीसरी जनहित याचिका पर भी सुनवाई हुई, जिस पर हाई कोर्ट ने इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा और नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को नोटिस जारी किए हैं। तीसरी याचिका पर अगली सुनवाई 19 जनवरी को होगी, जबकि पहली दो याचिकाओं पर 6 जनवरी को सुनवाई तय की गई है। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता मनीष यादव ने मृतकों के परिजनों को दी जाने वाली मुआवजा राशि बढ़ाने की मांग की और कहा कि स्टेटस रिपोर्ट में केवल चार मौतों का जिक्र है, जबकि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।

हाईकोर्ट की 5 सबसे तीखी टिप्पणियां

“लोग पानी पीकर मर रहे हैं, यह बर्दाश्त से बाहर है”: कोर्ट ने कहा कि एक तरफ आप स्वच्छता के पुरस्कार जीत रहे हैं और दूसरी तरफ बुनियादी जरूरत ‘साफ पानी’ देने में विफल हैं। यह पूरी तरह से प्रशासनिक विफलता है।

“जवाबदेही तय हो”: जस्टिस ने पूछा कि जब जनता हफ्तों से गंदे पानी की शिकायत कर रही थी, तो नगर निगम के इंजीनियर और स्वास्थ्य अधिकारी क्या कर रहे थे?

“दोषियों पर हत्या का केस क्यों न चले?”: कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह केवल लापरवाही नहीं है, बल्कि ‘आपराधिक कृत्य’ की श्रेणी में आता है।

“AC कमरों का कल्चर बंद करें”: कोर्ट ने नगर निगम कमिश्नर को फटकार लगाते हुए कहा कि जमीनी हकीकत दफ्तरों में बैठकर नहीं, बल्कि गलियों में उतरकर पता चलती है।

“मुआवजा पर्याप्त नहीं है”: सरकार द्वारा घोषित 2-2 लाख की राशि पर कोर्ट ने कहा कि पैसा किसी की जान वापस नहीं ला सकता, व्यवस्था सुधारने पर ध्यान दें।

वर्तमान स्थिति

पूरे भागीरथपुरा इलाके को प्रशासन ने ‘रेड जोन’ घोषित कर दिया है। नगर निगम अब टैंकरों के जरिए पानी बांट रहा है, लेकिन कोर्ट ने इस पर भी सवाल उठाया कि “क्या टैंकर का पानी भी पीने योग्य है?”

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