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‘महानायक का आखिरी मोर्चा’! क्या रालेगणसिद्धी से फिर निकलेगा कोई नया ‘विकल्प’, या यह केवल देशहित की तपस्या है?

Anna Hazare on Hunger Strike

Anna Hazare on Hunger Strike: वही सफेद टोपी, वही खादी का कुर्ता और वही अडिग संकल्प! आज सुबह जब रालेगणसिद्धी के यादवबाबा मंदिर में शंखनाद हुआ, तो पूरे देश की धड़कनें तेज हो गईं। 88 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे एक बार फिर ‘आमरण अनशन’ के रणक्षेत्र में उतर चुके हैं।

अन्ना हजारे का यह अनशन किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस ‘सिस्टम’ के खिलाफ है जिसे वे वर्षों से बदलने की कोशिश कर रहे हैं। इस बार अन्ना का आरोप है कि जिस लोकपाल के लिए पूरा देश सड़कों पर उतरा था, उसे सरकार ने ‘दंतविहीन’ बना दिया है। (Anna Hazare on Hunger Strike)

वे राजनीति में बढ़ते धनबल और दागी चेहरों के प्रवेश के खिलाफ ‘राइट टू रिकॉल’ जैसे कड़े कानूनों की मांग कर रहे हैं। ​अन्ना का मानना है कि ‘स्मार्ट सिटी’ के दौर में ‘आदर्श गांव’ का सपना कहीं पीछे छूट गया है।

क्या इस बार भी किसी नई ‘आम आदमी पार्टी’ का जन्म होगा? (Anna Hazare on Hunger Strike)

आपको बता दें कि, ​अन्ना के इस अनशन ने दिल्ली के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। सबसे बड़ा सवाल जो हर आम आदमी के जेहन में है— “क्या इस बार भी किसी नई ‘आम आदमी पार्टी’ का जन्म होगा?” 2011 के आंदोलन ने भारतीय राजनीति को ‘केजरीवाल’ और ‘AAP’ जैसा एक नया अध्याय दिया था।

आज फिर वही माहौल है। गलियों में चर्चा है कि क्या अन्ना के मंच का इस्तेमाल करके कोई नया चेहरा राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने की तैयारी में है? क्या यह अनशन फिर से सत्ता के समीकरण बदलेगा या इस बार अन्ना की ‘नैतिक शक्ति’ केवल समाज सुधार तक ही सीमित रहेगी? तो वहीं अन्ना के समर्थकों का कहना है कि अन्ना ने कभी सत्ता नहीं चाही। उनका मकसद केवल व्यवस्था परिवर्तन है। (Anna Hazare on Hunger Strike)

लोकतंत्र में जनता की आवाज सर्वोपरि

इस बार वे और भी सतर्क हैं ताकि उनके आंदोलन का इस्तेमाल राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए न हो सके। इस बार देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और नैतिक मूल्यों के पतन के बीच, यह अनशन एक ‘स्टॉप सिग्नल’ की तरह है, जो सरकार को यह याद दिलाएगा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज ही सर्वोपरि है। (Anna Hazare on Hunger Strike)

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि, क्या अन्ना का यह अनशन भारत के भविष्य को एक नई दिशा देगा, या फिर यह राजनीति के चालाक खिलाड़ियों के लिए एक और अवसर बनकर रह जाएगा? रालेगणसिद्धी की मिट्टी से उठी यह धूल दिल्ली के तख्त तक पहुँचने लगी है। ​”इतिहास गवाह है, जब-जब अन्ना मौन हुए हैं, सत्ता डरी है। और जब-जब वे उपवास पर बैठे हैं, व्यवस्था बदली है।”

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