UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिला है। आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव को एक बड़ा झटका लगा है। सपा से लंबे समय से बागी चल रहे तीन प्रमुख विधायकों राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी ने आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया है।
14 अक्टूबर 2026 को अमेठी के गौरीगंज में आयोजित एक भव्य सदस्यता ग्रहण समारोह में इन तीनों नेताओं ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की। इस मौके पर भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और पूर्व केंद्रीय मंत्री व राष्ट्रीय महासचिव स्मृति ईरानी सहित भाजपा के कई दिग्गज नेता मौजूद रहे, जिन्होंने इन बागी विधायकों का पार्टी में स्वागत किया।
UP Politics: कौन हैं भाजपा में शामिल होने वाले तीन विधायक?
भाजपा में शामिल हुए तीनों नेताओं का अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत जमीनी जनाधार माना जाता है। इनके आने से भाजपा को अवध और बुंदेलखंड के इलाकों में बड़ी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
- राकेश प्रताप सिंह (गौरीगंज, अमेठी): राकेश प्रताप सिंह अमेठी जिले की गौरीगंज विधानसभा सीट से लगातार तीन बार (2012, 2017 और 2022) सपा के टिकट पर विधायक चुने गए हैं। वे क्षेत्र के एक बेहद प्रभावशाली और कद्दावर नेता माने जाते हैं।
- अभय सिंह (गोसाईगंज, अयोध्या): अभय सिंह अयोध्या जिले की गोसाईगंज सीट से सपा के विधायक हैं। वे पहली बार 2012 में और फिर दूसरी बार 2022 में विधानसभा पहुंचे। अयोध्या और आसपास के क्षेत्रों में ठाकुर मतदाताओं के बीच उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।
- विनोद चतुर्वेदी (कालपी, जालौन): विनोद चतुर्वेदी बुंदेलखंड के जालौन जिले की कालपी विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे साल 2007 और फिर 2022 में विधायक चुने गए। बुंदेलखंड क्षेत्र में ब्राह्मण मतदाताओं के बीच उनका खासा प्रभाव है।
2024 राज्यसभा चुनाव से शुरू हुई थी दूरी
इन तीनों विधायकों की समाजवादी पार्टी से दूरी आज से करीब दो साल पहले, फरवरी 2024 में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान शुरू हुई थी। उस वक्त इन नेताओं ने सपा के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ जाकर भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की थी। इस बगावत के कारण सपा के तीसरे राज्यसभा उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा था। (UP Politics)
इस क्रॉस-वोटिंग के बाद, जून 2025 में समाजवादी पार्टी ने इन तीनों विधायकों को ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ और ‘सांप्रदायिक विभाजनकारी नकारात्मकता’ के आरोपों में पार्टी से निष्कासित कर दिया था। तब से ये तीनों सदन में निर्दलीय सदस्यों के रूप में बैठ रहे थे और सपा के किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में हिस्सा नहीं ले रहे थे।
दलबदल की वजह: ‘सनातन और राम विरोध’ का लगाया आरोप
भाजपा की सदस्यता लेने के बाद इन नेताओं ने अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर जमकर निशाना साधा। अभय सिंह ने पाला बदलने की वजह साफ करते हुए कहा, “जो भगवान राम का विरोध करेंगे, हम उनके विरोधी हो जाएंगे।” उन्होंने आरोप लगाया कि सपा के भीतर प्रभु श्री राम के अस्तित्व पर सवाल उठाए जा रहे थे और रामचरितमानस को जलाने जैसी घटनाओं को नजरअंदाज किया गया। उन्होंने कहा कि सपा में अब देशहित के बजाय केवल जाति और परिवार के हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।
वहीं, कालपी विधायक विनोद चतुर्वेदी ने कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की विकास नीतियों से प्रभावित होकर भाजपा में आए हैं, जिन्होंने बुंदेलखंड के कायाकल्प के लिए ऐतिहासिक काम किया है। (UP Politics)
राजनीतिक मायने और भाजपा की चुनावी रणनीति
आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले हुए इस घटनाक्रम को भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इससे पहले राज्यसभा चुनाव में बगावत के सूत्रधार रहे सपा के पूर्व मुख्य सचेतक मनोज कुमार पांडेय ने भी भाजपा जॉइन की थी, जिन्हें मई 2026 में योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री के पद से नवाजा गया था। इसी को देखते हुए सियासी गलियारों में चर्चा है कि भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में इन तीनों बागी नेताओं को उनकी पुरानी सीटों से चुनावी मैदान में उतार सकती है।
अमेठी में आयोजित इस कार्यक्रम में स्मृति ईरानी ने कांग्रेस और सपा गठबंधन पर तीखा हमला बोला और कहा कि विपक्षी दल जमीनी हकीकत से दूर हो चुके हैं। राकेश प्रताप, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी के भाजपा में आने से न सिर्फ सपा को झटका लगा है, बल्कि विपक्षी एकता के दावों को भी ठेस पहुंची है। (UP Politics)
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन तीन अनुभवी और जमीनी पकड़ रखने वाले विधायकों का भाजपा में शामिल होना यह दर्शाता है कि सूबे में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। जहां भाजपा इस दलबदल के जरिए अवध और बुंदेलखंड में अपनी स्थिति को अभेद्य बनाने की कोशिश में है, वहीं अखिलेश यादव के सामने चुनाव से पहले अपनी पार्टी के कुनबे को बिखरने से बचाने की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।









