उत्तर प्रदेश की सत्ता में 2027 में वापसी के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को धरातल पर उतारने के लिए अखिलेश अब एक ऐसी रणनीति पर काम कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के परंपरागत दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं। अखिलेश यादव का ‘मास्टर प्लान’ इन सभी 84 सीटों पर न केवल मजबूत उम्मीदवार उतारना है, बल्कि वहां दलित समाज के स्थानीय समीकरणों को साधने के लिए विशेष कमेटियां भी तैनात करना है। सपा का मानना है कि बसपा के ग्राफ में आई गिरावट के बाद दलित मतदाता अब एक ऐसे विकल्प की तलाश में हैं जो भाजपा को कड़ी टक्कर दे सके।
फिलहाल अखिलेश यादव की रणनीति केवल आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं है। अयोध्या (फैजाबाद) लोकसभा सीट पर सामान्य सीट होने के बावजूद दलित उम्मीदवार (अवधेश प्रसाद) की जीत ने सपा को एक नया ‘विनिंग फॉर्मूला’ दे दिया है।

आपको बताते चलें कि पिछले कुछ चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि बसपा का कोर वोटबैंक (जाटव और गैर-जाटव दलित) धीरे-धीरे छिटक रहा है। अखिलेश यादव इसी वैक्यूम को भरने की कोशिश में हैं। अखिलेश अपने भाषणों में अब बार-बार बाबा साहेब अंबेडकर और डॉ. लोहिया की विचारधारा के मिलन की बात कर रहे हैं। और सपा अब दलित बाहुल्य बस्तियों में ‘संविधान रक्षक’ जैसे अभियान चलाकर युवाओं को जोड़ने की योजना बना रही है। इससे साफ है कि सपा PDA पर विशेष बल देना चाहती है ताकि 2027 के चुनाव में इसको हथियार बनाकर इसपर दाव खेल सके।

जानकारों का मानना है कि यदि अखिलेश यादव दलित वोटों का 15-20% हिस्सा भी सपा के पक्ष में मोड़ने में सफल रहते हैं, तो 2027 की राह उनके लिए काफी आसान हो सकती है। हालांकि, भाजपा की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और बसपा की अपनी जमीन बचाने की कोशिशें इस राह में बड़ी चुनौतियां होंगी।









